Tuesday, June 22, 2021

अब बच्चों को भी हो सकता है अल्जाखइमर्स

 

Alzheimerदुनियाभर में 21 सितंबर को अल्‍जाइमर्स डे मनाया जाता है। लोगों को लगता है कि अल्‍जाइमर्स यानी भूलने की बीमारी सिर्फ बुजुर्गों को होती है जबकि ऐसा नहीं है। अब बच्‍चों और किशोरों को होने वाली बीमारी निएमन पिक डिजीज टाइप सी का निम’नेम चाइल्‍डहुड अल्‍जाइमर्स है। अल्‍जाइमर्स की ही तरह इस बीमारी में भी मौत की कोई फिक्‍स या टिपिकल अगुवाई नहीं देखी जाती है। एनपीसी में मरीज को नियमित रूप से दौरे पड़ने, डिमेंशिया, संयोजन और गति‍शीलता में परेशानी का एहसास होता है। साथ ही बोलने खाने व कुछ निगलने में भी परेशानी होती है।

एनपीसी बीमारी आमतौर पर एक लाख पचास हजार में से किसी एक को होती है साथ ही आमतौर पर यह बेहद असामान्‍य होती है, लेकिन जिसको भी होती है उस मरीज और उसके परिवार के सदस्‍यों को बहुत ज्‍यादा परेशानी में डाल देती है। प्रभावित बच्‍चा कई वर्षों के कालक्रम में धीरे धीरे मानसिक और शारीरिक कमजोरी के बढ़ने का एहसासा करता है ठीक वैसे ही जैसे अल्‍जाइमर्स डिजीज में होता है। जबकि निएमन पिक डिजीज टाइप सी का अल्‍जाइमर्स से कोई संबंध नहीं है। जबकि अल्‍जाइमर्स की शुरुआत उम्र के 40वें और 50वें दशक में देखी जाती है।

एनपीसी एक लिपिड स्‍टोरेज डिजीज है। एक तरह का मेटाबॉलिक डिसऑर्डर है जिसमें अतिरिक्‍त कोलेस्‍ट्रॉल शरीर की कोशिकाओं और टिशूज में जमा हो जाता है। जमाव मस्तिष्‍क की कोशिकाओं और टिशूज पेरिफेरल नर्वस सिस्‍टम और बोन मैरो को धीरे धीरे स्‍थायी रूप से डैमेज कर देता है। अभी तक एफडीए द्वारा मान्‍यता प्राप्‍त कोई भी इलाज उपलब्‍ध नहीं है लेकिन एक नई दवा एसिक्‍लोडेक्स्ट्रिन ने प्रभावित परिवारों के लिए उम्‍मीद की नई किरण दी है।

इस बीमारी में सबसे पहले और सबसे अधिक सशक्‍त लक्षण है मस्तिष्‍क की कार्यशीलता पर असर। यह बीमारी शरीर की संरचना व अन्‍य आवश्‍यक अंगों को भी प्रभावित कर सकती है, जिससे बच्‍चे की बुद्धिमत्‍ता, संतुलन और बोलने की क्षमता प्रभावित होती है। एनपीसी से प्रभावित बच्‍चे को उपर नीेचे देखने के लिए आंखों को घुमाने में भी तकलीफ होती है। वह पलको को अधिक झपका सकता है या गर्दन को झटक सकता है, उसे दौरे भी पड़ेंगे और गतिशीलता सम्‍बंधी समस्‍या भी होती है। इस बीमारी में अन्‍य अनुवांशिक बीमारियों के विपरीत बच्‍चे के जन्‍म के समय यह पता लगा पाना लगभग नामुमकिन है कि कोई समस्‍या है।

इससे पीडि़त बच्‍चे तब तक पूरी तरह से सामान्‍य दिखाई देते हैं जब तक कि वे स्‍कूल जाने के उम्र में नहीं पहुंच जाते। स्‍कूल जाने के बाद उन्‍हें सीखने में समस्‍या होती है। इनमें से कुछ बच्‍चों में गति सम्‍बंधी दिक्‍कतें शुरू हो जाती है जैसे ठीक ढंग से बात नहीं करना, कुछ को दौरे पड़ना, तथा व्‍यवहार सम्‍बंधी समस्‍या होना तो कुछ को पागलपन के लक्षण दिखाई देना है। इस बीमारी में मृत्‍यु अक्‍सर 20 साल की उम्र के आस पास होती है।

साभार- एनबीटी

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