Sunday, September 19, 2021

एम्‍स ने नस में खून जमने की बीमारी का खोजा इलाज

AIIMS Discovered blood vessels treatmentखून की नस यानी धमनी में‍ किसी कारण से सूजन आ जाती है और खून की दीवार कमजोर होने लगती है जो नस किसी गुब्‍बारे की तरह फूल जाती है जिसे एन्‍यूरिज्‍म कहते हैं। खून की नसों में गुब्‍बार का समय पर इलाज नहीं होने से यह फट जाती है। अब एम्‍स ने मॉर्डन तकनीक से एन्‍यूरिज्‍म का इलाज करने लगी है। एम्‍स के डॉक्‍टर ने कहा कि मेडिकली इस तकनीक को फलो डायवर्टर स्‍टेंट कहा जाता है। क्‍योंकि इसका साइज 10 से 24 एमएम तक होता है। इसी वजह से इसे पाइप लाइन तकनीक से भी जाना जाता है। जिसकी सफलता रेट में काफी इजाफा हुआ है।

इस तकनीक का इलाज स्‍टेंट क्‍वाइलिंग के जरिए होता था जिसमें स्‍टेंट डाला जाता था जहां पर गुब्‍बार बना है उसे खत्‍म करने के लिए उसके अंदर क्‍वाइल डाल दिया जाता था। इसलिए इसे स्‍टेंट असिस्‍टेड क्‍वाइलिंग कहा जाता था। इसके बाद और बेहतर तकनीक आई जिसे बलून असिस्‍टेड क्‍वाइलिंग कहा जाता है। इस तकनीक में स्‍टेंट की जगह ब्‍लून का यूज किया जाता है।

जहां पर गुब्‍बारा बनता है, उसमें अगर खून सप्‍लाई जारी रहेगी तो उसके फटने का खतरा रहता है इसलिए ऐसे मामले को तुरंत ट्रीटमेंट करने की जरूरत होती है। फलो डायर्वट का फायदा यह है कि इसमें क्‍वाइल नहीं डालनी होती है। एक बड़ा साइज का स्‍टेंट डाल दिया जाता है जिससे ब्‍लड फलो शुरू हो जाता है। फूले हुए हिस्‍से में खून नहीं जाता है और फिर धीरे धीरे गुब्‍बारे की तरह फूला हुआ हिस्‍सा भी धीरे’धीरे बैठ जाता है।

डॉक्टर गायकवाड़ ने कहा कि स्टेंट क्वाइलिंग का खर्च डेढ़ लाख होता है, जबकि बलून तकनीक में 3 लाख का औसतन खर्च है। फ्लो डायवर्टर तकनीक में 7 लाख खर्च होता है, लेकिन यह पहले की तुलना में ज्यादा सेफ और बेहतर रिजल्ट देती है। डॉक्टर का कहना है कि अब तक इस तकनीक से 40 से ज्यादा मरीजों का इलाज किया जा चुका है।

Total Views : 599 views | Print This Post Print This Post

About कुमार आशु

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

BIGTheme.net • Free Website Templates - Downlaod Full Themes